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आप्पा ले चडयो रे सगरमाथा
अठार पटक
आठअरौं अठार
सताब्दी देखी हामी पनि चढि रहेन्छौं
सगरमाथा
अभाब को, पीडा को , आशान्तिको,
कुनै दिन लाशको हिमाल पनि टेकेर हिड्योउं
हाम्रो सगरमाथा चुलीरहेछ
अनन्त यात्रा
हामी ओर्लन खोजी रहेन्छौं , आप्पा चडन
कस्तो बिरोधभाष ?
एउटै भूमी मा दुई चुचुरो
यि दुई सगरमाथा
चुचुरो मा पुगेर
के सोच्यो होल आप्पाले ?
एक मान्छे अग्लो सगरमाथा बनाएर
शायद
उस्ले सोच्यो होला
फेरी आउँछु , फेरी चडछु
अजङको अठोट फेरी गर्यो होला
+++++
आज नँया बिहानी को शु-संघारमा
कारीब आठचालिश दर्जन टा उका हरू
ठेलम ठेला गर्दै
शफत ग्रहण गर्दा
के तानाबाना बुने होलान ?
के सोच मा डुबे होलान ?
के अठोट गरे होलान ?
शायद
भोली ले बताउने छ
हाम्रो सगरमाथा को नँया उचाइ ले बताउने छ
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